लालू यादव को साढ़े तीन साल कैद और दस लाख रुपए जुर्माना

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लालू यादव को साढ़े तीन साल कैद और दस लाख रुपए जुर्माना
Sunday, January 7, 2018 3:04 AM

लालू यादव एक निर्धन परिवार से उठ कर राजनीति में उच्च शिखर पर पहुंचे। अपने लम्बे राजनीतिक सफर के दौरान वह केंद्र में पूरे 5 साल रेल मंत्री रहने के अलावा 3 बार बिहार के मुख्यमंत्री भी बने। बिहार के मुख्यमंत्री काल के दौरान 1996 में सामने आए 950 करोड़ रुपए के ‘चारा घोटाले’ में संलिप्तता के चलते उन्हें पद से त्यागपत्र देना पड़ा।

इस केस में कुल 45 लोगों को आरोपी बनाया गया था तथा इस घोटाले में 16 साल बाद विशेष सी.बी.आई. अदालत ने 1 मार्च, 2012 को लालू, पूर्व मुख्यमंत्री जगन्नाथ मिश्र व अन्यों पर आरोप तय किए। अदालती कार्रवाई के लम्बे दौर के बाद 30 सितम्बर, 2013 को उक्त घोटाले में सी.बी.आई. ने लालू और जगन्नाथ मिश्र व अन्यों को दोषी ठहराया जिसके बाद 3 अक्तूबर, 2013 को सी.बी.आई. अदालत ने लालू यादव को 5 साल के कारावास की सजा सुनाई परंतु बाद में उन्हें जमानत मिल गई। इस समय लालू पर अनेक अलग-अलग मामले लंबित हैं तथा 8 मई, 2016 को सुप्रीमकोर्ट के आदेश पर सभी मामलों में उनके विरुद्ध आपराधिक षड्यंत्र के आरोपों के अंतर्गत अलग-अलग मुकद्दमे चलाए जा रहे हैं।

सी.बी.आई. ने झारखंड हाईकोर्ट के उस फैसले के विरुद्ध सुप्रीमकोर्ट में अपील की थी जिसमें झारखंड हाईकोर्ट ने लालू के विरुद्ध चारा घोटाले में आपराधिक साजिश की जांच समाप्त कर दी थी। इस पर सुप्रीमकोर्ट ने 8 मई, 2017 को अपना फैसला सुनाया और झारखंड हाईकोर्ट का फैसला पलट कर सी.बी.आई. की दलील स्वीकार करते हुए हर केस में अलग-अलग मुकद्दमा चला कर 9 महीने के भीतर इसका ट्रायल पूरा करने का आदेश दिया था जिसके बाद लालू के विरुद्ध आपराधिक षड्यंत्र का केस चलाया गया। इसी शृंखला में चारा घोटाले से जुड़े एक मामले में रांची की विशेष सी.बी.आई. अदालत ने 23 दिसम्बर, 2017 को लालू यादव सहित 16 लोगों को दोषी ठहराया जबकि बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री डा. जगन्नाथ मिश्र आदि को साक्ष्य के अभाव में बरी कर दिया।

न्यायाधीश शिवपाल सिंह की अदालत ने सजा पर फैसला 3 जनवरी के लिए सुरक्षित रख लिया था जो 3 जनवरी की बजाय 6 जनवरी को सुनाते हुए लालू को भारतीय दंड संहिता और भ्रष्टïाचार निरोधक अधिनियम की विभिन्न धाराओं के अंतर्गत साढ़े 3 साल कारावास के साथ ही 10 लाख रुपए जुर्माने की सजा सुनाई। चूंकि यह सजा 3 साल से अधिक की है इसलिए उन्हें इसी अदालत से जमानत नहीं मिलेगी। 1990 से 1994 के बीच देवघर कोषागार से 89 लाख 27 हजार रुपए का फर्जीवाड़ा कर अवैध ढंग से पशुचारे के नाम पर निकासी के इस मामले में लालू यादव पर आरोप है कि उन्होंने साजिश रचने वालों को बचाने की कोशिश की। सी.बी.आई. का कहना था कि लालू यादव को गबन के बारे में पता था फिर भी उन्होंने इस लूट को नहीं रोका।

उल्लेखनीय है कि लालू यादव चारा घोटाले के 4 और मामलों में भी अभियुक्त हैं जिनकी सुनवाई रांची में सी.बी.आई. की अलग-अलग अदालतों में चल रही है इनमें से एक और मामले में जल्द ही फैसला आ सकता है। लिहाजा लालू प्रसाद की मुश्किलें अभी और बढ़ सकती हैं जबकि इन दिनों वह पहले ही अपने बेटे तेज प्रताप सिंह व अन्य परिजनों पर लगे मिट्टी घोटाले व अन्य आरोपों के कारण संकट में पड़े हुए थे। हैरानी की बात है कि 1996 में हुआ घोटाला अभी तक किसी अंजाम तक नहीं पहुंचा है क्योंकि अब उक्त फैसले के विरुद्ध अपीलों का सिलसिला शुरू हो जाएगा। राजनीतिज्ञों की सम्पत्ति और भ्रष्टाचार में भारी वृद्धि होने का एक कारण मुकद्दमों का लंबे समय तक खिंचते चले जाना भी है जिससे राजनीतिज्ञों को डर नहीं रहता। लिहाजा भ्रष्टïाचार के मामलों की जांच एवं अदालती कार्रवाई जल्द से जल्द निपटाना बहुत आवश्यक है।—विजय कुमार

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